अम्मी की तीन सीख
मेरी अम्मी एक इस्लामिक शिक्षक (मुल्लानी) हैं। मैंने बचपन से ही अपने घर में आस पास की अमीर, ग़रीब सभी लड़कियों को पढ़ने आते देखा है। सभी लड़कियों को अम्मी फ़्री में ही पढ़ाया करती हैं। आज 2020 तक अम्मी सेकडों लड़कियों को पढ़ा चुकी हैं।
मेरे लिए अम्मी की पहली सीख:-
मेरे घर के आस पास ज़्यादातर मुस्लिम आवादी है। बचपन मैं मेरा दूसरे धर्म वाले बच्चों से कोई ताल्लुक़ नहीं रहा था। मैंने जब स्कूल जाना शुरू किया तो हमारे स्कूल में भी मुस्लिम बच्चे की तादात ज़्यादा थी और कुछ अलग अलग धर्म के बच्चे भी साथ पढ़ते थे। इस देश, समाज या इंसानो की विडम्बना ही मानो की जो शक्तिशाली या बहुमत मैं होता है उसे लगता है कि उसका ही धर्म, जाती या वर्ग सर्वोपरि है। हमें भी कुछ ऐसा ही लगता था।एक दिन हमने अपनी कक्षा में पढ़ने वाले अपने दोस्त को प्रभावित कर एक मांसाहारी होटेल में अपने साथ खाना खिलाने ले गए। इसको लेकर हम बहुत ख़ुश हुए जैसे की आज हमने बहुत बड़ा कुछ धार्मिक काम किया हो, घर आकर अपनी कहानी अपनी अम्मी को सुनाई और सोचा की आज अम्मी बहुत ख़ुश होगी परंतु हुआ इसके एकदम विपरीत अम्मी ने हमें बहुत डाँटा, मैंने अपनी अम्मी को कभी इतना ग़ुस्सा नहीं देखा था। उन्होंने मुझे सिखाया के अगर हम किसी को धोका देकर उसका धर्म भ्रष्ट करते हैं या करने का प्रयास करते हैं तो उसका तो नहीं पर हमारा धर्म ज़रूर भ्रष्ट हो जाता है।
मैं मात्र 7 या 8 साल का था लेकिन यह बात मेरे मन में इतनी गहराई तक गयी के फिर कभी जीवन मैं ऐसा करने का विचार भी नहीं आया।
अम्मी की दूसरी सीख:-
"इंसान सबसे बड़ा जानवर तब बन जाता है जब वह अपने जैसो के ही साथ रहता है"।अपने धर्म या अपने आप को महान और दूसरे व्यक्ति या उसके धर्म को तुच्छ मानना यह मूलता मनुष्य की आदत है और यह आदत उस वक़्त और बढ़ जाती है जब आप अपने ही जैसों के साथ रहते हैं। मेरा हाल भी कुछ ऐसा ही था हमने अपनी यह महानता अपनी अम्मी को बतायी के हमें जब भी किसी दूसरे धर्म का कोई प्रार्थना स्थल दिखता है तो हम उसे देखकर गंदा चेहरा बनाते हैं।
इसके लिए एक बार फिर हमें अम्मी की डाँट खनी पड़ी, अम्मी ने बताया के क़ुरान में लिखा है कि इस दुनिया में लगभग 1,24,000 पैग़म्बर (Messanger of Allah) दुनिया में अलग अलग वक़्त पर आए हैं हम बहुत कम ही के बारे में जानते और पढ़ते हैं पता नहीं सायद उन्मे से कोई एक यही हो, में यह नहीं कहती के तुम जाकर उनके जैसा करो लेकिन उनको बुरा मत कहो या देखो, अगर तुम उनके धर्म को बुरा कहोगे तो वो तुम्हारे धर्म को बुरा कहेंगे और मुझे पता है के तुम नहीं चाहोगे के कोई तुम्हारे धर्म को बुरा कहे।
अम्मी की तीसरी सीख:-
मैं जब 12 वी कक्षा में आया तो मेरी बहुत सारी लड़की दोस्त थी मैं उनके बारे में अपनी अम्मी और बहन को बताया करता था के कौन लड़की कैसे बात करती है, कैसे चलती है, कैसे पढ़ती है इत्तियादि। मेरे घर पर मेरी लड़की दोस्त से किसी को कोई ऐतराज़ नहीं था।
मेरी अम्मी ने एक दिन मुझे अपने पास बिठाया और कहा के लड़कियों से बात करना या साथ में उठना बैठना ग़लत नहीं है जब साथ पढ़ रहे हो तो यह सब आम बात है बस किसी की बहन बेटी के साथ ऐसा मत करना के अगर कोई तुम्हारी बहन बेटी के साथ वैसा करे तो तुम्हें बुरा लगे। अल्लाह ने फ़रमाया है के आप अगर किसी लड़की के साथ कुछ ग़लत करते हो तो आपके साथ भी वैसा ही होगा।
आज मैं 30 साल का हो चुका हूँ अम्मी की यह तीन सीख साथ में लेकर चलते हुए आज अलग अलग जाती, धर्म, वर्ग के हज़ारों लड़के लड़की दोस्त हैं साथी हैं। मुझे याद भी नहीं रहता के कौन किस धर्म या जाती का है, हर किसी से इतना प्यार, साथ और सम्मान मिला है कि इसके लिए वक़्त ही नहीं।
Ye bhut ache baat hai main bhi ek muslim hu , mere pass bhi itna time nai hai kise ko main uske religions se phechanu khuki sb ka pyar bhut jada or acha hai.
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